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पंचतत्व मे विलीन हुए डाक्टर एस. डी. मिश्रा, : सेवा, संवेदना और समर्पण के एक युग का अंत लेकिन सवालो के घेरे मे व्यवस्था

Chhatarpur | 29-Apr-2026 10:09 AM | 109 |
Chhatarpur
सेवा,  संवेदना और समर्पण के एक युग का अंत लेकिन सवालो के घेरे मे व्यवस्था

छतरपुर जिले के लवकुश नगर मे डॉक्टर एसडी मिश्रा अपने घर पर रात लगभग 9:00 बजे मौजूद थे,सब कुछ सामान्य था, रोज की तरह उन्होंने अपनी क्लिनिक में मरीज भी देखे थे,  तमाम मरीजो का उपचार किया था, यद्यपि वे बीपी, शुगर के पेशेंट थे अक्सर स्ट्रेस में रहते थे, लेकिन इन सबके बावजूद भी अपनी सभी परेशानियां भूल कर पूरी तन्मयता और आत्मीयता से अपनी क्लीनिक में आने वाले हर मरीज को उचित, सुलभ और सस्ता उपचार लिखते थे, 
डॉ एस डी मिश्रा का लवकुश नगर में रहना बच्चों के लिए वरदान जैसा था,  लेकिन नियति को को शायद कुछ और मंजूर था,  रात लगभग 9:00 बजे जब उनके पास एक पेशेंट पहुंचा तब उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था लेकिन फिर भी अपने कमरे में बुलाकर मरीज का हाल जाना और उसे उपचार भी लिखा, तभी उन्हें अचानक सीने में दर्द की हुआ और उन्होंने विपिन गुप्ता जो की मेडिकल स्टोर संचालक हैं और डॉक्टर साहब के बेहद करीबी थे उन्हें बुलाया, विपिन तत्काल वहां पहुंचे डॉक्टर साहब ने उनसे दवा देने को कहा इससे पहले की विपिन उन्हें दवा खिला पाते, तब तक डॉक्टर साहब अचेत होकर अपने बिस्तर पर गिर पड़े थे, बिपिन ने आवाज़ लगाई तो तुरंत बल्लू चौबे उनके भाई,वीरेंद्र त्रिपाठी व साकेत वहां पहुंचे और तत्काल डॉक्टर मिश्रा जी गाड़ी के जरिये अस्पताल ले जाया गया, डॉक्टर साहब को अपने साथ ले जाने वाले वीरेंद्र त्रिपाठी व बल्लू चौबे ने बताया कि हमने डॉक्टर साहब को अस्पताल के अंदर बेड पर लिटा दिया , लेकिन उस समय मौके पर कोई भी एमरजेंसी डॉक्टर भी मौजूद नहीं था,  हम लोग इधर से उधर भागते रहे, फोन लगाते रहे डॉक्टर को बुलाने के लिए कहते रहे,  वीरेंद्र त्रिपाठी लगातार डॉक्टर मिश्रा को सीपीआर भी देते रहें, लेकिन मौके पर आधे घंटे तक कोई भी डॉक्टर नहीं पहुंचा,   वहां पर उस वक्त कोई भी सुनने वाला नहीं था,  बस जो कर्मचारी मौजूद थे वह इधर से उधर भाग दौड़ करते रहे, काफी देर बाद एक कर्मचारी ने ऑक्सीजन लगाने का प्रयास किया, 
लेकिन अस्पताल की “इमरजेंसी” खुद इमरजेंसी में थी। न डॉक्टर, न व्यवस्था, न जवाबदेही।
आधे घंटे के उपरांत एक डॉक्टर साहब आते हैं और डॉक्टर मिश्रा का परीक्षण करते हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और लवकुश नगर क्षेत्र में एक देवतुल्य सेवा भावी, श्रेष्ठ चिकित्सक खो दिया था।

डॉ मिश्रा के निधन की खबर सुनते हैं नगर के सैकड़ो लोग अस्पताल पहुंचे हर हर कोई गमगीन था,  हर आंख नम थी, डॉ मिश्रा तो देवलोक चले गए लेकिन अपने पीछे न सिर्फ अपने परिवार को बेसहारा छोड़ गए, बल्कि वे हजारों- हजार परिवार जिन्हें डॉक्टर साहब ने अपनो के जैसा स्नेह दिया, हमेशा उचित परामर्श और उपचार दिया, वह भी बेसहारा हो गये!

बेशक न जाने कितने डॉक्टर आए और चले गए, आगे भी आएंगे,  बहुत से डॉक्टर योग्य भी आए,  लेकिन डॉक्टर मिश्रा की जगह कोई नहीं ले सकेगा ।

डॉ मिश्रा 80 -90 के दशक में उत्तर प्रदेश के ओरन गांव से लवकुश नगर की धरती पर आए तो बस यहीं के होकर रह गए,  उनके सेवा काल का लगभग पूरा समय मेडिकल ऑफिसर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुडेरी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लवकुश नगर में बीता, रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपने घर पर ही क्लीनिक का संचालन किया और अंतिम समय तक लोगों को सेवाएं प्रदान करते रहे।
मृत्यु अटल है, एक दिन सभी को जाना है,  लेकिन वह इंसान जिसने उस अस्पताल में अपने सेवाकाल के वर्षों बिताये, न जाने कितने मरीजो को जिस अस्पताल में जीवन दान दिया, उसी जगह डॉ मिश्रा के अंतिम समय उन्हें देखने के लिए एक डॉक्टर उपलब्ध नहीं हुआ ।

लवकुशनगर अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली कोई नई बात नहीं है, डॉ मिश्रा का निधन फिर से कई सवाल खड़े कर गया,

डॉ मिश्रा के अस्पताल पहुंचने के समय एमरजेंसी में किस डॉक्टर की ड्यूटी थी ?
 क्या संबंधित के खिलाफ जांच और कार्रवाई नहीं होनी चाहिए ?

आखिर कब तक हम सब कठपुतली बने रहेंगे ? 
आखिर कब तक अवस्थाओं के खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे ?

आखिर कब तक हम सिर्फ यह सोचते रहेंगे कि हमें क्या ? कौन सा हमारे या किसी अपने के साथ कुछ हुआ है ?

आखिर कब तक हम सिर्फ जिंदाबाद- जिंदाबाद की राजनीति करते रहेंगे, और वास्तविक मुद्दों और समस्याओं से मुंह फेरते रहेंगे ?

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