डॉ. रजनीकांत स्मृति सेवा प्रकल्प के नि:शुल्क मेगा स्वास्थ्य शिविर में 800 से अधिक मरीजों का इलाज, मोतियाबिंद ऑपरेशन व तालू-कटे बच्चों की सर्जरी भी हुई
गोरखपुर। समाज में स्वास्थ्य सेवा के प्रति सच्ची संवेदना और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए डॉ. रजनीकांत स्मृति सेवा प्रकल्प के तत्वावधान में रविवार को नवाब कॉटेज, पुर्दिलपुर स्थित डॉ. रजनीकांत क्लीनिक परिसर में नि:शुल्क मेगा स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया गया। सुबह 9 बजे शुरू हुआ यह शिविर पूरे दिन मरीजों के लिए उम्मीद का सहारा बना रहा। करीब 900 से अधिक मरीजों ने पंजीकरण कराया, जिनमें से 800 से अधिक मरीजों का वरिष्ठ चिकित्सकों ने परामर्श कर नि:शुल्क इलाज किया और दवाइयां भी दीं।
गरीब मरीजों के लिए ‘जीवनदान’ साबित हुआ यह शिविर
सिवान (बिहार) से आई नेहा ने भावुक होते हुए कहा —
“आर्थिक तंगी के कारण इलाज नहीं करा पा रही थी। यहां न तो फीस लगी, न दवा का पैसा। मेरे बेटे के कान का ऑपरेशन मुफ्त में हुआ… मेरे लिए यह किसी वरदान से कम नहीं।”
इसी तरह देवरिया से आए 50 वर्षीय अशोक बोले —
“शुगर और अन्य बीमारियों से महीनों से परेशान था। महंगी दवाओं के कारण इलाज अधूरा रह जाता था। यहां सबकुछ नि:शुल्क हुआ… अब भरोसा है कि मैं ठीक हो जाऊंगा।”
मोतियाबिंद ऑपरेशन से लेकर तालू-कटे बच्चों की सर्जरी तक हुई
शिविर में हड्डी, मेडिसिन, स्त्री रोग, बाल रोग, न्यूरो, ईएनटी, दंत, नेत्र, सर्जरी और हृदय रोग विभाग के अनुभवी चिकित्सकों ने अपनी सेवाएं दीं।
75 से अधिक मरीजों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन नि:शुल्क किए गए, जिन्हें चश्मे भी दिए गए।
जन्मजात बहरे बच्चों के कानों की सर्जरी (कॉक्लियर इम्प्लांट) और
कटे होंठ व तालू वाले बच्चों की प्लास्टिक सर्जरी भी निःशुल्क की गई।
“सेवा ही चिकित्सा का सबसे बड़ा धर्म है” — डॉ. अभिलाष
शिविर के संयोजक डॉ. अभिलाष ने कहा —
“यह शिविर केवल इलाज नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। हमारा प्रयास है कि कोई मरीज सिर्फ पैसे के अभाव में उपचार से वंचित न रहे।”
आयोजन समिति की सदस्य अनुपम श्रीवास्तव ने कहा —
“सैकड़ों मरीजों को बिना एक रुपये लिए जीवन की नई रोशनी मिली… यही इस शिविर की सबसे बड़ी सफलता है।”
कार्यक्रम में डॉ. विजाहत करीम, डॉ. एस.एम. सिन्हा, डॉ. महेंद्र अग्रवाल, डॉ. आसिफ मसूद, डॉ. राजेश यादव सहित 40 से अधिक चिकित्सकों ने सेवाएं दीं।
इस स्वास्थ्य शिविर ने साबित कर दिया कि जब चिकित्सा ज्ञान संवेदना से जुड़ता है, तो अस्पताल नहीं बल्कि जीवन बदलने वाले तीर्थ स्थान बनते हैं।