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विश्व कठपुतली दिवस पर कल का संरक्षण संवर्धन करने एवं हमारी भूमिका विषयक विचार

प्रकाशित: 21 Mar 2026

अलौली। विश्व कठपुतली दिवस पर फरकिया मिशन देश बचाओ अभियान के तत्वाधान में श्री युवक प्रखंड पुस्तकालय के सभागार में कठपुतली कला का संरक्षण संवर्धन एवं हमारी भूमिका विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता अभियान के संस्थापक अध्यक्ष किरण देव यादव ने किया। 
विलुप्त हो रही कठपुतली कला बचाओ, सभ्यता संस्कृति बचाओ, धरोहर विरासत बचाओ, देश बचाओ नारों के साथ विश्व कठपुतली दिवस पर प्राचीन कला कठपुतली खेल कलाकारों को हार्दिक बधाई शुभकामनाएं देश बचाओ अभियान के संस्थापक अध्यक्ष किरण देव यादव ने दिया । 
ऑल इंडिया मिशन आर्टिस्ट एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष किरण देव यादव ने कठपुतली कला का संरक्षण संवर्धन नवीनीकरण विस्तारीकरण एवं जन जन तक पहुंचाने तथा संस्कृत विरासत के अस्तित्व को बचाने हेतु कला एवं संस्कृति मंत्री एवं जिला पदाधिकारी तथा माननीय प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री से किया ।
श्री यादव ने कहा कि हर वर्ष 21 मार्च को कठपुतली कला को बढ़ावा देने के लिए विश्व भर में विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है। विश्व कठपुतली दिवस की शुरुआत 2003 में यूनेस्को से संबद्ध एक गैर-सरकारी संगठन यूनिमा द्वारा की गई थी। 21 मार्च 2003 को पहला विश्व कठपुतली दिवस मनाया गया। मनोरंजन का सशक्त माध्यम रहीं कठपुतलियां जागरूकता का काम भी कर रही हैं। कठपुतलियों के जरिए सामाजिक मुद्दों को रोचक तरीके से भी उठाया जा रहा। कठपुतलियां सुशिक्षित और स्वस्थ समाज का भी बुलंद संदेश दे रहीं। इतिहास में दर्ज नामों की प्रेरक कहानियों को कठपुतलियों के जरिए लोगो तक पहुंचाने के भी प्रयास हो रहे हैं।
मिशन सुरक्षा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता किरण देव यादव ने कहा कि कठपुतली दिवस मनाने का उदेश्य कठपुतली कला को बढ़ावा देना संरक्षण संवर्धन नवीनीकरण विस्तारीकरण है। साथ-साथ ही परंपराओं संस्कृति को बनाए रखना और उनकी रक्षा करना है। नैतिक और सौंदर्य शिक्षा के साधन के रूप में कठपुतली का उपयोग करना हैं। कठपुतली एक प्रकार का कथा रंगमंच है जिसमें कठपुतलियों, मानव या जानवरों से मिलती-जुलती निर्जीव वस्तुएँ शामिल हैं। 
पंच सरपंच संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष खगड़िया जिला अध्यक्ष किरण देव यादव ने आगे बताया कि कठपुतली 6 प्रकार का है जिसमें
मैरियोनेट – तार व रांड द्वारा चलाया जाने वालारॉड मैरियोनेट, हाथ की कठपुतलियाँ – हाथ के ऊपर ढीली पकड़ वाली, रॉड कठपुतलियाँ – एक छड़ी के समर्थित, छायाचित्र – एक बैकलिट स्क्रीन के पीछे उतारा गया, बुनरकू शैली की कठपुतलियां – दर्शकों के पूर्ण दृश्य में हेरफेर ।
कठपुतली कला का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। यह रंगमंच पर खेले जाने वाले प्राचीनतम खेलों में एक है।
कठपुतली का निर्माण लकड़ी या पेरिस ऑफ प्लास्टर की या कागज की लुगदी की बनी होती है| कठपुतली के शरीर के भाग इस प्रकार जुड़े होते हैं की उन से बंधी डोर खींचने पर अलग-अलग खेल सकें। किसी समय राजस्थान की कठपुतली सबसे ज्यादा मशहूर होती थी। लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों, जानवरों की खाल से बनी कठपुतलियों को रंगीन चटखदार गोटे, कांच, घुंघरू, चमकदार रेशमी कपड़े से तैयार किया जाता था। सजे-धजे इन कठपुतलियों के पात्र सभी का मन मोह लेते थे। बनावट के साथ-साथ इन कठपुतलियों का खेल प्रदर्शन मंत्रमुग्ध करने वाला होता था। राजस्थान में राजा-रानी, सेठ-सेठानी, जमींदार-किसान और जोकर जैसे पात्रों को लेकर कठपुतलियां बनाई जाती थीं।
कठपुतली नृत्य लोकनाट्य की शैली कही जाती है। इसमें गुड़ियों के माध्यम से जीवन के प्रसंगों की अभिव्यक्ति का मंचन किया जाता है।
कठपुतली प्राचीन काल से ही लोगों के मनोरंजन का एक साधन रहा है। विद्वानों की मानें तो भारतीय नाट्यकला का जन्म भी कठपुतली के खेल से ही हुआ है। इस आर्ट को लोगों के बीच और अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस के अवसर पर संगीत उत्सव को देश के बड़े शहरों में आयोजित किया जाता रहा है।
कठपुतली के इतिहास ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में महाकवि पाणिनी के अष्टाध्याई ग्रंथ में पुतला नाटक का जिक्र मिलता है। साथ ही सिंहासन बत्तीसी नामक कथा में भी 32 पुतलियों का उल्लेख किया गया है। पुतली कला की प्राचीनता के संबंध में तमिल ग्रंथ ‘शिल्पादिकार’ से भी जानकारी मिलती है।
कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपनी पुत्री सरस्वती को मनोरंजन हेतु कठपुतली निर्माण कर खेलने दिया था। 
राजस्थान में व्यापक तौर पर कठपुतली का निर्माण होता है जो बच्चों का पहला पसंद होता है। 
समाजसेवी सह स्वतंत्र पत्रकार किरण देव यादव ने कहा कि मुजफ्फरपुर के सरल श्रीवास सामाजिक संस्कृत शोध संस्थान के संयोजक संरक्षक सुनील कुमार तथा कटिहार के जन जागृति मंच के द्वारा कठपुतली के माध्यम से जागरूकता नुक्कड़ नाटक कठपुतली नृत्य लोक संगीत सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है, कला को जीवंत किए हुए हैं, अस्तित्व बचाने को संघर्षरत संकल्पित हैं, जो सर्वप्रिय सराहनीय है। 
श्री यादव ने उक्त कठपुतली कलाकारों को कलाकार पेंशन देने, कठपुतली कला को विकसित संबंधित संरक्षित करने एवं बढ़ावा देने की मांग सरकार एवं कला संस्कृति मंत्री पदाधिकारी से किया।
विचार गोष्ठी कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता बृजनंदन महतो महेश्वर यादव दानवीर यादव रामचंद्र यादव दिनेश शाह लालमणि सदा विष्णु देव यादव विजय सिंह अजय पासवान विनोद राम सुरेश यादव आदि ने बीते जमाने में कठपुतली नृत्य देखने की अनुभव शेयर किया, कहा कि अलौली चैती दुर्गा रामनवमी मेला में तीन दशक पूर्व भाव कठपुतली नाच कार्यक्रम हुआ था। आज मोबाइल के चकाचौंध में पुरानी सभ्यता संस्कृति कठपुतली नृत्य का अस्तित्व हो रही है जिसे संवर्धन करने की जरूरत है।
इधर, मुजफ्फरपुर के कठपुतली कलाकार सुनील कुमार  एवं कटिहार के जितेंद्र पासवान ने कहा कि यदि सरकार के द्वारा कठपुतली कलाकारों को सम्मान सहयोग समर्थन मिले तो कठपुतली कला आधुनिक जमाने में भी बेहतर मनोरंजन का साधन के साथ अभिव्यक्ति व जागरूकता का सशक्त माध्यम हो सकती है।