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बाढ पीड़ितो के लिए बाढ शोक एव सरकार के लिए वरदान साबित होता है

प्रकाशित: 07 Nov 2025

अलौलीखगडिया बिहार - वर्तमान आसन्न विधानसभा चुनाव में बाद सुखाड़ कटाव एवं बांध के अंदर जनजीवन जीविका इस चुनावी माहौल, घोषणा पत्र एवं नेताओं के भाषण में मुद्दा नहीं बन सका, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। पार्टीयों की घोषणा पत्र राजनैतिक दिशाहीनता, अदूरदर्शिता, संवेदनहीनता अनुभवहीनता, सौतेलापन उदासीनता का परिचायक है।
उक्त बातें नदी घाटी मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक किरण देव यादव ने कहा। 
नदी बचाओ, जल बचाओ, जन जीवन बचाओ, जीविका बचाओ, देश बचाओ, नारों को बुलंद करते हुए देश बचाओ अभियान के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष किरण देव यादव ने कहा कि चुनाव में सत्ता पक्ष - प्रतिपक्ष नेताओं में बांध के अंदर एवं बांध के बाहर की बाढ़ से निजात पाने हेतु उनके संकल्प पत्रों में दूरदृष्टि, संवेदना, अनुभव, दिशा, चेतना, का घोर अभाव है।
फरकिया मिशन के संस्थापक अध्यक्ष किरण देव यादव ने कहा कि विस्थापन, पुनर्वास, जल जमाव, जल निकासी, बाढ़, सुखाड़, पलायन, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अग्निकांड आपदा से पहले दौरान बाद की तैयारी एवं स्थाई समस्या का समाधान के संदर्भ में घोषणा पत्र में जिक्र तक नहीं किया गया। विकास से अछूता फरकिया का सर्वांगीण विकास हेतु कोई मास्टर प्लान घोषणा पत्र में नहीं दिखा। जबकि फरकिया में कोसी शोक के रूप में जाना जाता है। कोसी कमला करेह बागमती बलान गंडक गंगा सात नदियों का नैहर कहलाने वाली खगड़िया आज भी आजादी के 78 साल बाद भी टोडरमल के जमाने से फरकिया विकास से फरक है।
श्री यादव ने कहा कि चुनावी रणभूमि में दोनों गठबंधन अपने तरकश से घोषणाओं का बाण चला चुके हैं। किंतु विशेष कर सत्ता पक्ष का तीर हवाओं में ही चला है। कुछ सतही तौर पर इंडिया महागठबंधन का संकल्प पत्र सरजमीनी है, जो सराहनीय है लेकिन ऐसे मुख्य ज्वलंत मुद्दे पर घोषणा करने से चूक गए, जबकि बिहार की बड़ी आबादी बांध के अंदर बाढ़ सुखाड़ कटाव, बांध के बाहर शहरी बाढ़, जल जमाव, जल निकासी की समस्या से ग्रसित है, इस वोटर को नहीं साध सके।
श्री यादव ने कहा कि बिहार के 38 जिले में 28 जिले बाढ़ प्रभावित है जबकि 15 जिले अत्यंत बाढ़ अतिग्रसित है। वहीं 10 जिले सुखाड़ से प्रभावित है। उत्तर बिहार के 76 प्रतिशत आबादी बाढ़ से अति प्रभावित होते हैं। फरकिया में फसल, पशु, पशु आहार, उपजाऊ जमीन, जनजीवन प्रभावित होती है। साल के चार पांच महीने जिंदगी जीना फरकिया वासी को दूभर हो जाती है। वहीं शहरी क्षेत्र में दो-तीन महीने बरसाती बाढ़ से नारकीय जिंदगी जीने को विवश रहते हैं।
यहां गंगा गंडक घाघरा बागमती सोन महानंदा बड़ी नदी प्रवाहित होते हैं। उत्तर बिहार के लगभग 94000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में 68000 वर्ग किलोमीटर यानी 73 प्रतिशत भूभाग के 76 प्रतिशत आबादी बाढ़ प्रभावित रहती है। इतनी बड़ी आवादी के मद्देनजर जनपक्षीय दृष्टिकोण से घोषणा पत्र में समाहित करना अत्यंत आवश्यकता थी। जल संसाधन, बाढ़ सुखाड़ नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर सजग होने की जरुरत है।
श्री यादव ने कहा कि एनडीए ने घोषणापत्र में पांच साल में बाढ़ से मुक्त बिहार करने की जुमले का पुनरावृत्ति की है। नदी जोड़ परियोजना, कोशी जलाशय निर्माण, तटबंध, पंप नहर, चेक डैम, बैराज, निर्माण डपोरशंखी साबित हुई है घोषणाएं हास्यास्पद है। चुंकि कोई रोड मैप नहीं है। पांच बरसों में बाढ़ को समाप्त करना मात्र जुमला प्रतीत होता है। कोशी क्षेत्र के लोग " विकास का काला पानी " की सजा भुगतने को विवश है। जल आपदाओं से निपटने की कोई दूरदर्शी योजना नहीं है। हिमालयी नदियों का जलवायु परिवर्तन का प्रभाव का दुष्परिणाम वैज्ञानिक तौर पर अध्ययन किए बगैर नीति निर्धारण नहीं की गई है। कई नदी जल विशेषज्ञ का कथन - नदी को अविरल बहने दो,  की सिद्धांत पर अंततः योजना बनाने की जरुरत है चुंकी विगत दिनों 5-6 लाख क्यूसेक पानी आने पर बाढ का त्राहिमाम रहा। यदि बांध टूटता तो प्रलय हो जाता। अब तक 378 बार बांध टूट चुका है, जान माल की काफी क्षति होती रही है जिसका आकलन का सही आंकड़ा नामालूम है। राहत, मरम्मत, निर्माण में खरबों रुपए खर्च होता है। वहीं ऊपर से लेकर नीचे तक लूट का तांडव होता है। ऊपर ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं। बाढ़ पीड़ितों के लिए बाढ़ - शोक, एवं सरकार के लिए - वरदान, साबित होता है। आपदा में कमाने का अवसर मिल जाता है। मोदी के कितना अनुसार आपदा नहीं अवसर है। चालाक लोमड़ी आपदा में अवसर ढूंढ ही लेते हैं।
उक्त समस्या के स्थायी समाधान के संदर्भ में घोषणा पत्र में कोई जिक्र नहीं किया गया है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
श्री यादव ने आगामी सरकार से उपरोक्त संदर्भ में वैज्ञानिक टीम द्वारा अध्ययन कर ठोस रणनीति के तहत मास्टर प्लान बनाने एवं धरातल पर उतारने की मांग किया। तभी सच्चे अर्थों में सामाजिक न्याय का सिद्धांत सरजमीं पर उतरेगा।