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देवरिया पुलिस की मुठभेड़ की कहानी कोर्ट में फेल

प्रकाशित: 15 Nov 2025
देवरिया पुलिस की मुठभेड़ की कहानी कोर्ट में फेल, तीन पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज करने का आदेश

#देवरिया।
बनकटा थाना क्षेत्र में पुलिस द्वारा दिखाई गई “मुठभेड़” की कहानी अदालत में पूरी तरह फेल हो गई। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) मंजू कुमारी की अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूरे प्रकरण को संदिग्ध मान लिया। अदालत ने न सिर्फ आरोपी दिलीप सोनकर का रिमांड निरस्त किया बल्कि बनकटा थाने के एसआई सुशांत पाठक, हेड कांस्टेबल राजेश कुमार और कांस्टेबल सज्जन चौहान के खिलाफ 48 घंटे के भीतर मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

गुरुवार को जारी आदेश में CJM ने कहा कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत कहानी तथ्यों और साक्ष्यों से मेल नहीं खाती। अदालत ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि “सौभाग्य की बात है कि किसी भी पुलिसकर्मी को गोली नहीं लगी,” जो पुलिस की कहानी को अविश्वसनीय बनाता है। कोर्ट ने मुठभेड़ की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल उठाते हुए कहा कि पूरी घटना को जिस तरीके से प्रस्तुत किया गया, उसमें स्पष्ट रूप से कानूनी प्रक्रिया और पुलिसिया तर्क का अभाव दिखाई देता है।

CJM ने थानाध्यक्ष गोरखनाथ सरोज की विधि समझ पर भी प्रश्नचिह्न लगाया। अदालत ने कहा कि एफआईआर में मुठभेड़ के आवश्यक कानूनी तत्व नहीं हैं, और यह स्पष्ट है कि पुलिस की कहानी में गंभीर विरोधाभास मौजूद हैं। इसी आधार पर अदालत ने मुठभेड़ की पुलिसिया थ्योरी को खारिज कर दिया।

क्या थी पुलिस की कहानी?

आरोपित दिलीप सोनकर को 12 नवंबर को पशु क्रूरता अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर हवालात में रखा गया था। पुलिस का दावा है कि पेट दर्द की शिकायत पर उसे तीन पुलिसकर्मी अस्पताल ले जा रहे थे। रास्ते में उसने शौच जाने की बात कही और मौका पाकर एसआई सुशांत पाठक की होल्स्टर से पिस्टल छीन ली—जबकि पिस्टल रस्सी से बंधी हुई थी।

पुलिस के अनुसार, दिलीप ने उसी पिस्टल से पुलिस टीम पर फायर कर दिया। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने गोली चलाई, जो दिलीप के पैर में लगी। लेकिन अदालत ने स्पष्ट कहा कि पेश किए गए साक्ष्य पुलिस के दावों से मेल नहीं खाते और घटना पूरी तरह संदिग्ध प्रतीत होती है।

पहले भी रची गई थी ऐसी ही कहानी

सबसे खास बात यह है कि कुछ दिन पूर्व सलेमपुर क्षेत्र में भी बिल्कुल इसी तरह की ‘मुठभेड़’ की कहानी गढ़ी गई थी, जिसमें आरोपित के पैर में गोली लगने का दावा किया गया था। इससे पुलिस की कार्रवाई पर और अधिक सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या अपराधियों को पकड़ने के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों का ट्रेंड बनता जा रहा है? 

कोर्ट के आदेश के बाद बनकटा पुलिस की मुश्किलें बढ़ गई हैं। तीनों पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज होने के बाद उनके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है। यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली और ‘एनकाउंटर मॉडल’ पर एक बार फिर गहरा सवाल खड़ा करता है।