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ग़ाज़ियाबाद की घटना ने लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर उठाए सवाल : दलित महिला के सम्मान की लड़ाई और समाज की चुप्पी

गाजियाबाद | 27-Aug-2025 12:34 AM | 11 |
गाजियाबाद
दलित महिला के सम्मान की लड़ाई और समाज की चुप्पी

लेखिका : निधि चौधरी, सामाजिक कार्यकर्त्ता

ग़ाज़ियाबाद की घटना ने हमारे लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर मेरा अपमान हुआ और इससे पहले शाहरुख़ खान नाई ने एक बाल्मीकि दलित महिला विनेश उर्फ़ लाली बुआ का भी अपमान किया था। बाल्मीकि समाज की इस महिला को जातिसूचक शब्द कहे गए और पूरे मोहल्ले में दलित समाज चुप रहा।

और तो और, जब हमने न्याय की आवाज़ उठाई, तब आरोपी पक्ष झूठे आरोप लगाकर प्रशासन के पास शिकायत करने पहुँचा और पुलिस पर ही झूठे आरोप लगाने लगा। यह एक ख़ास समुदाय की सोची-समझी चाल है, ताकि अपराधी शाहरुख़ खान नाई को बचाया जा सके। यह कैसा लोकतांत्रिक देश है, जो सच्ची घटना को झूठ के सामने झुकाने की कोशिश करता फिरता है?

क्या यही लोकतांत्रिक भारत है, जहाँ दलित बस्ती की महिला के साथ हुए अन्याय पर कार्रवाई करने की बजाय उसकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जाता है?

मैं स्वयं एक ओबीसी महिला होकर दलित महिला के सम्मान और न्याय के लिए अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल सिंह आर्य के पास, दिल्ली बीजेपी केंद्रीय कार्यालय में शिकायत लेकर गई और साथ ही दिल्ली एससी आयोग तक यह लड़ाई पहुँचाई।

इस संघर्ष में अखिल भारतीय महर्षि वाल्मीकि साधु अखाड़ा परिषद के महंत गुरुजी राजू चंदेल का समर्थन भी मिला। उन्होंने आश्वासन दिया है कि 30 अगस्त को ग़ाज़ियाबाद की बाल्मीकि महिला विनेश (लाली बुआ) का सार्वजनिक सम्मान किया जाएगा और न्याय की माँग उठाई जाएगी।

यह केवल एक महिला का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न है। आज आवश्यकता है कि समाज जाति और धर्म से ऊपर उठकर अन्याय के खिलाफ एकजुट हो। मुस्लिम नाई द्वारा किया गया यह अपमान न केवल एक महिला का, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की मूल भावना का अपमान है।

– निधि चौधरी
सामाजिक कार्यकर्त्ता

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