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आगरा बिजली व्यवस्था की गलत बिडिंग दबाई गई: कैग रिपोर्ट पर करार रद्द करने की मांग

प्रकाशित: 11 Sep 2025

गोरखपुर। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि आगरा की बिजली व्यवस्था टोरेंट पावर को सौंपने की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों से घिरी रही है। समिति का दावा है कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने इस बिडिंग प्रक्रिया को दस साल पहले ही गलत करार दिया था, लेकिन उस समय रिपोर्ट दबा दी गई।

संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि इस करार से उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन को हर साल हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि जब तक यह करार समाप्त नहीं किया जाता, तब तक यह घाटा और बढ़ता जाएगा। उन्होंने मांग की कि आगरा फ्रेंचाइजी करार को तत्काल रद्द किया जाए और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित लोगों पर कठोर कार्रवाई की जाए।

समिति ने आगाह किया कि सिर्फ आगरा ही नहीं, बल्कि पूर्वांचल व दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया को भी रोका जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि निजीकरण की यह प्रक्रिया जारी रही, तो आने वाले वर्षों में पावर कॉरपोरेशन को और अधिक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा, जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं और राज्य की ऊर्जा व्यवस्था पर पड़ेगा।

समिति के नेताओं ने बताया कि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा था कि बिडिंग प्रक्रिया के दौरान गलत आंकड़े प्रस्तुत किए गए। इन गड़बड़ियों के कारण टोरेंट पावर को सस्ती दरों पर बिजली उपलब्ध कराई गई। अनुमान के अनुसार, इस अनुबंध के कारण पावर कॉरपोरेशन को 18 वर्षों में 4600 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होना तय था। समिति का कहना है कि अभी तक ही 3400 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा दर्ज हो चुका है, जो जनता के हितों के साथ सीधा खिलवाड़ है।

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आगरा फ्रेंचाइजी करार को तत्काल रद्द नहीं किया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। समिति का कहना है कि वे कर्मचारी और उपभोक्ता दोनों के हित में यह लड़ाई लड़ रहे हैं और सरकार को किसी भी सूरत में जनता की गाढ़ी कमाई को कॉरपोरेट घरानों के हाथों में जाने से रोकना होगा।

संघर्ष समिति ने इस मुद्दे को केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही से भी जोड़ा। समिति का कहना है कि यदि इस मामले पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में बिजली वितरण व्यवस्था पूरी तरह से निजी कंपनियों के शिकंजे में आ जाएगी, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।