मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थी होंगे आत्मविश्वासी : प्रो. सदानंद, राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
गोरखपुर, 12 अक्टूबर। महाराणा प्रताप महाविद्यालय, जंगल धूसड़ में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन रविवार को हुआ। इस संगोष्ठी का विषय था “राष्ट्रीय शिक्षा नीति भाषायी संदर्भ: चुनौतियां एवं समाधान”। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि आत्मबोध और राष्ट्रनिर्माण का मार्ग है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मातृभाषा में शिक्षा देने से विद्यार्थी अपनी जड़ों से जुड़ेंगे और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होंगे।
समापन सत्र में डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य प्रो. रामदरश राय ने कहा कि भाषाएँ हमारी संस्कृति और पहचान का आधार हैं। उन्होंने बताया कि वैश्विक संवाद के लिए अंग्रेजी जैसी सार्वभौमिक भाषा आवश्यक है, लेकिन मातृभाषा और स्थानीय बोलियों का संरक्षण उतना ही जरूरी है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को भारतीयता को पुनर्जीवित करने वाला मॉडल बताया।
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के डॉ. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी ने कहा कि भाषा विचारों की वाहक और संस्कारों की संवाहक है। मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थी में मौलिक चिंतन और सृजनात्मकता विकसित होती है। उन्होंने नई शिक्षा नीति को आत्मनिर्भर भारत के वैचारिक स्तंभ के रूप में प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी की संयोजिका डॉ. आरती सिंह ने बताया कि दो दिनों तक चले इस राष्ट्रीय विमर्श में देशभर के विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने शिक्षा नीति के भाषायी आयामों पर गहन विचार-विमर्श किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव, गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में तृतीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. सुशील कुमार पांडेय ने की, जबकि विषय प्रवर्तन डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. प्रत्यूष दुबे ने किया। उन्होंने मातृभाषा के महत्व और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से भारतीयता के पुनर्जागरण पर प्रकाश डाला। चतुर्थ तकनीकी सत्र में प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थी केवल ज्ञान ही नहीं, जीवन मूल्य भी सीखते हैं।
समापन सत्र का संचालन डॉ. अर्चना गुप्ता और आभार ज्ञापन डॉ. हनुमान प्रसाद उपाध्याय ने किया। संगोष्ठी ने यह स्पष्ट किया कि मातृभाषा में शिक्षा न केवल भाषा और संस्कृति को संरक्षित करती है, बल्कि विद्यार्थियों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास और भारतीयता का भाव भी विकसित करती है।