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प्रो. चंद्रकला पाडिया ने कहा: सामाजिक विज्ञान में यूरोकेन्द्रित दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता

प्रकाशित: 10 Oct 2025

गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा ‘डिकोलोनाइजिंग सोशल साइंसेज: ए स्टेप टुवर्ड्स प्रोटेक्टिंग इंडियाज रिच कल्चरल हेरिटेज’ विषयक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज शिमला की पूर्व अध्यक्ष एवं महाराजा गंगा सिंह यूनिवर्सिटी बीकानेर की पूर्व कुलपति प्रो. चंद्रकला पाडिया रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता अधिष्ठाता कला संकाय प्रो. कीर्ति पांडेय ने की।

मुख्य वक्ता प्रो. चंद्रकला पाडिया ने अपने व्याख्यान में कहा कि सामाजिक विज्ञानों में यूरोकेन्द्रित दृष्टिकोण को बदलने की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं को भारतीय परिप्रेक्ष्य और दृष्टि से पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है और विभिन्न अध्ययनों में भारतीय बौद्धिक परंपरा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उन्होंने अरविंदो का उदाहरण देते हुए कहा कि राष्ट्रवाद की विवेचना ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण के आधार पर की जानी चाहिए। उनका विचार था कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक उच्च चेतना का प्रतिनिधि है, जिसका प्रचार और संरक्षण भारतवर्ष द्वारा ही संभव है। यह दृष्टिकोण राष्ट्र की आत्मा का सम्मान करते हुए मानवता के कल्याण की दिशा में अग्रसर है।

प्रो. पाडिया ने नारीवाद और समानता पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि पश्चिमी परिभाषाएं पुरुषोचित हैं और महिलाओं के श्रम को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय समाजशास्त्र और नीति निर्माण में महिला श्रम और सामाजिक योगदान को समान रूप से मान्यता मिलनी चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. कीर्ति पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित ज्ञान के आधार पर समाज की अनेक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। विषय परिवर्तन तथा स्वागत उद्बोधन विभागाध्यक्ष प्रो. अनुराग द्विवेदी ने किया। संचालन कार्यक्रम समन्वयक डॉ. मनीष पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दीपेंद्र मोहन सिंह ने किया।

इस अवसर पर विभागीय शिक्षक प्रो. अंजू, डॉ. पवन कुमार, डॉ. प्रकाश प्रियदर्शी, एचआरपीजी कॉलेज खलीलाबाद से डॉ. विजय मिश्रा, साथ ही बड़ी संख्या में शोधार्थी, छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम में उपस्थित सभी ने प्रो. पाडिया के विचारों से प्रभावित होकर भारतीय सामाजिक विज्ञान और शिक्षा के नए दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।