बिना आदेश प्रधानाचार्या और डिप्टी कमिश्नर की मिलीभगत : विद्यालय कोठा का ध्वस्तीकरण? दरवाजे-खिड़कियां ईंट और सरिया गायब, प्रधान को सूचना तक नहीं
बिना आदेश प्राथमिक विद्यालय कोठा का ध्वस्तीकरण? दरवाजे-खिड़कियां गायब, प्रधान को सूचना तक नहीं
उपशीर्षक: विद्यालय भवन गिराए जाने की प्रक्रिया पर सवाल, प्रधानाचार्या नूरजहां और डिप्टी कमिश्नर नीरज शुक्ला की भूमिका की जांच की मांग
शाहजहांपुर। कांट क्षेत्र पंचायत बिक्रमपुर के प्राथमिक विद्यालय कोठा के ध्वस्तीकरण को लेकर अब कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि विद्यालय भवन को सक्षम स्तर से स्पष्ट आदेश के बिना ही ध्वस्त करा दिया गया और इस पूरी कार्रवाई की जानकारी ग्राम प्रधान को तक नहीं दी गई। इतना ही नहीं, ध्वस्तीकरण के बाद विद्यालय के दरवाजे, खिड़कियां ,ईंट और सरिया भी गायब हैं।
मामला सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी विद्यालय की इमारत को गिराने का आदेश किसने दिया? यदि भवन जर्जर घोषित किया गया था तो क्या नियमानुसार तकनीकी जांच और नीलामी/निस्तारण की प्रक्रिया पूरी की गई? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि ग्राम प्रधान को इस कार्रवाई की सूचना क्यों नहीं दी गई?
स्थानीय स्तर पर प्रधानाचार्या नूरजहां और डिप्टी कमिश्नर नीरज शुक्ला की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ लोगों द्वारा दोनों की मिलीभगत के आरोप लगाए जा रहे हैं, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
दरवाजे-खिड़कियां कहां गईं?
विद्यालय भवन के ध्वस्तीकरण के बाद निकली सामग्री का हिसाब-किताब भी जांच का विषय बन गया है। यदि दरवाजे, खिड़कियां और अन्य सामान सरकारी संपत्ति थे, तो उनके निस्तारण की प्रक्रिया क्या रही? क्या इनकी कोई सूची बनाई गई? क्या नीलामी या विभागीय रिकॉर्ड में इनका उल्लेख है?
प्रधानाचार्या के जवाब पर भी सवाल
मामले को लेकर प्रधानाचार्या से जब जवाब मांगा गया तो कोई ऐसा ठोस और स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया, जिससे ध्वस्तीकरण की पूरी प्रक्रिया साफ हो सके। इससे ग्रामीणों और स्थानीय लोगों के बीच संदेह और बढ़ गया है।
प्रशासन से जांच की मांग
अब मांग उठ रही है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। ध्वस्तीकरण का आदेश, तकनीकी रिपोर्ट, विभागीय अनुमति, ग्राम प्रधान को दी गई सूचना और ध्वस्तीकरण से निकली सामग्री के निस्तारण का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
सीधा सवाल यह है—अगर सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ है तो आदेश और सरकारी रिकॉर्ड सामने लाने में परेशानी क्या है? जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि विद्यालय भवन का ध्वस्तीकरण नियमों के तहत हुआ या प्रक्रिया में कहीं गंभीर अनियमितता बरती गई।