गोरखपुर।दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ तरंग द्वारा आयोजित नवरंग गरबा महोत्सव 2025 के अंतर्गत सोमवार को गरबा कार्यशाला का दूसरा दिन उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। इ...
गोरखपुर।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ तरंग द्वारा आयोजित नवरंग गरबा महोत्सव 2025 के अंतर्गत सोमवार को गरबा कार्यशाला का दूसरा दिन उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर प्रतिभागियों में खासा उत्साह देखने को मिला।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि, विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से आयोजन को विशेष बना दिया। उन्होंने न केवल आयोजन की सराहना की बल्कि विद्यार्थियों और प्रतिभागियों के साथ गरबा नृत्य की झलक भी प्रस्तुत की। अपने प्रेरणादायी संबोधन में कुलपति ने कहा—“इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों और कला-प्रेमियों को भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़ती हैं। यह परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी प्रेरित करती हैं।”
गोरखपुर विश्वविद्यालय में पहली बार आयोजित हो रहे इस तरह के आयोजन को लेकर विद्यार्थियों और नागरिकों में उत्साह का माहौल है। बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। यह कार्यशाला 28 सितम्बर 2025 तक चलेगी। इसके बाद 29 सितम्बर को नवरंग गरबा महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाएगा, जिसमें विद्यार्थियों और शहरवासियों की भारी भागीदारी की उम्मीद है।
कार्यशाला की मुख्य प्रशिक्षक सुश्री अर्पिता उपाध्याय प्रतिभागियों को गरबा नृत्य की बारीकियों और विभिन्न शैलियों का प्रशिक्षण दे रही हैं। उन्होंने बताया कि गरबा केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि यह मन, शरीर और आत्मा को ऊर्जा प्रदान करने वाली कला है।
कार्यक्रम में तरंग की निदेशक प्रो. उषा सिंह ने कहा कि गरबा का गहरा मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभाव होता है। यह केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक संतुलन का भी साधन है।
इस अवसर पर अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. अनुभूति दुबे, प्रो. उमा श्रीवास्तव, प्रो. दिव्या रानी सिंह, तरंग के उपनिदेशक डॉ. गौरी शंकर चौहान, डॉ. प्रदीप कुमार साहनी, डॉ. प्रदीप राजौरिया समेत विश्वविद्यालय के कई शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन अभिषेक ने किया।
गोरखपुर विश्वविद्यालय में आयोजित यह कार्यशाला न केवल विद्यार्थियों बल्कि स्थानीय कला-प्रेमियों के लिए भी यादगार अनुभव साबित हो रही है। आयोजकों का मानना है कि इस प्रकार की पहल गोरखपुर की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगी तथा युवाओं को भारतीय परंपराओं से जोड़ने में सहायक होगी।