स्त्री वर्ष: समकालीन भारतीय साहित्य में नारी सृजन का उजास
विशेष रिपोर्ट: रविंद्र आर्य
नई दिल्ली।
भारतीय साहित्य का संसार निरंतर परिवर्तनशील है, जो समाज के उभरते स्वर, प्रश्न और संघर्षों को अपने भीतर समेटता चलता है। इसी निरंतरता को विस्तार देने और भारतीय स्त्री की सृजनात्मक उपस्थिति को रेखांकित करने के उद्देश्य से हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा “स्त्री वर्ष — भेंट, पाठ, चर्चा” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि स्त्री अनुभव की विविध परतों, सवालों और प्रतिरोध की दास्तान का सार्वजनिक उत्सव भी था।
कार्यक्रम में प्रस्तुत रचनाओं ने इस बात को प्रमाणित किया कि आज की भारतीय स्त्री, साहित्य में केवल भावनाओं की वाहक नहीं, बल्कि विचारों की निर्माता भी है।
गीतांजलि श्री की प्रस्तुति ‘सह-सा’ में मानवीय रिश्तों की सूक्ष्म जटिलताओं की खोज दिखाई दी।
अलकनंदा सरावगी ने ‘कलकत्ता कँपकँपौलिटन’ के माध्यम से महानगरीय जीवन की घुटन और संवेदना को नए मुहावरों में व्यक्त किया।
अनामिका की ‘दूर देश के परिन्दे’ स्मृति, पहचान और प्रवासन के मनोविज्ञान को खोलती है, तो प्रत्यक्षा ने ‘शीशाघर’ के माध्यम से स्त्री आत्मा की आंतरिक उलझनों और संघर्षों को सामने रखा।
वन्दना राग की ‘सरकफंदा’ सामाजिक संरचनाओं की निर्माण-प्रक्रिया और नियंत्रण तंत्र पर तीखी टिप्पणी करती है।
असना अज़दानी की ‘इस शहर में एक शहर था’ ने महानगर के भीतर छिपे समाज की परतें हटाने की कोशिश की।
सुजाता की ‘दरियागंज बाज़ार फते ख़ाँ’ बाजार और स्मृति के रिश्ते पर रोचक कथा कहती है।
सविता भागवत की ‘जहाँ पाँच पाँव वाला’ और शोभा लिप्सा की ‘शुकमाया हाडमा’ नए सांस्कृतिक संदर्भों और आदिवासी जीवन की विडंबनाओं को मंच पर लाईं।
इन सभी रचनाओं की प्रस्तुति ने यह स्थापित किया कि स्त्री अनुभव जितना व्यापक है, उतना ही उसकी अभिव्यक्ति का सौंदर्य और प्रतिरोध भी।
विचार और अनुभव का साझा मंचकार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग ने की, जिनकी उपस्थिति स्वयं एक परंपरा और असहमति की प्रतीक मानी जाती है।
इसके अलावा मंच पर प्रेरणा, मधु, अर्चना, नैना, सुधा, शांति, सुचित्रा और सविता जैसी प्रमुख लेखिकाएँ उपस्थित रहीं।
चर्चा में भाषा की राजनीति, मीडिया की भूमिका, स्त्री पात्रों का विकास, रचनात्मक स्वतंत्रता और बदलते सामाजिक ढाँचों पर गंभीर विमर्श हुआ।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आज की स्त्री कथानक की मात्र पात्र नहीं, बल्कि उसकी निर्माता है—जो कहानी को अपने दृष्टिकोण से लिखती और दिशा देती है।
कार्यक्रम 03 दिसंबर 2025, बुधवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, कमला देवी कॉम्प्लेक्स, मटिल्डापेप्स हॉल में आयोजित हुआ।
शाम 4:30 बजे चाय सत्र से शुरुआत और रात 8:30 बजे समापन तक यह परिसर साहित्यिक संवाद का केंद्र बना रहा।
कार्यक्रम को हिंदी अकादमी दिल्ली एवं भारतीय स्टेट बैंक (SBI) का सहयोग प्राप्त था।
दिल्ली के साहित्यप्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति ने इसे एक जीवंत और संवेदी आयोजन में परिवर्तित कर दिया।
“स्त्री वर्ष” कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि साहित्य में स्त्री का योगदान किसी सीमित परिभाषा में नहीं बँध सकता।
वह कवयित्री, कथाकार, चिंतक और समाज की द्रष्टा—सभी रूपों में उपस्थित है।
यह आयोजन न केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति का मंच बना, बल्कि स्त्री स्वरों की बौद्धिक स्वतंत्रता और वैचारिक विविधता का उत्सव भी—जो भविष्य के साहित्य को दिशा देने का वादा करता है।
— विशेष रिपोर्ट, रविंद्र आर्य