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डॉ. परविंद्र सिंह के शब्दों में— सनातन-विरोधी गठबंधन की हार

प्रकाशित: 19 Nov 2025

लेखक : रविंद्र आर्य | विचार : डॉ. परविंद्र सिंह

2025 के बिहार चुनाव ने भारत की राजनीति को सिर्फ नतीजों के आधार पर नहीं, विचारधारा और सांस्कृतिक चेतना के आधार पर नई दिशा दी है। 2020 में जो वामपंथी “विष-बेल” बिहार की धरती पर पनपना शुरू हुई थी— तुष्टीकरण, जातिवाद, धार्मिक विभाजन और कट्टरपंथी समूहों को पर्दे के पीछे बढ़ावा देने वाली— उसे बिहार ने पाँच साल में ही ज़ोरदार झटका देते हुए पूरी तरह दफन कर दिया।

पेज3 न्यूज़ के संस्थापक डॉ. परविंद्र सिंह के अनुसार यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि “वामपंथी मानसिकता का सांस्कृतिक पराभव” है। वे मानते हैं कि बिहार की जनता ने न सिर्फ गठबंधन को हराया, बल्कि उस पूरे इको-सिस्टम को नकार दिया जिसने लगातार सनातन धर्म को अपमानित करने, हिंदू समाज को बांटने और राष्ट्रवाद को बदनाम करने का अभियान चला रखा था।

ओवैसी, अखिलेश और हार ढकने का बहाना — सर, ईवीएम  की नौटंकी

चुनाव परिणाम आने के बाद  के असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि “विपक्ष को सोचना चाहिए कि वह बीजेपी को क्यों नहीं रोक पा रहे।”
इधर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी हार का कारण फिर वही पुराना— सर,ईवीएम , सिस्टम की गड़बड़ी — बताकर जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया।

इसपर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. परविंद्र सिंह ने तीखा वार किया—

“कब तक सर -ईवीएम की बकवास करते रहेंगे? हार जनता के मूड से होती है, मशीन से नहीं।”

उन्होंने कहा कि हार गठबंधन की नीतियों, उनके तुष्टीकरण और सनातन-विरोधी एजेंडे की वजह से हुई है। जनता जाति-धर्म की दुकानदारी नहीं खरीदती; वह सुरक्षा, संस्कृति और राष्ट्रवाद चाहती है।

गठबंधन की हार = सनातन-विरोध, वामपंथ और तुष्टीकरण की हार

इस चुनाव में स्पष्ट दिखा कि—

जो पार्टियाँ “विशेष समुदाय” को खुश करने और सनातन को गाली देने में लगी थीं— जनता ने उन्हें पूरी तरह नकार दिया।

✓ सभी पार्टियों का वोट प्रतिशत देखें—
✓ हर तरफ जनता ने एनडीऐ पर भरोसा दिखाया
✓ कांग्रेस का “सूपड़ा साफ”
✓ बिहार धीरे-धीरे कांग्रेस-मुक्त होता जा रहा है

डॉ. परविंद्र सिंह कहते हैं—

“बिहार की जनता ने जातिवाद नहीं, ‘संस्कृति और सुरक्षा’ को प्राथमिकता दी— यही असली जनादेश है।”

नेपाल ओर भारत में माओवाद खत्म — उसका असर बिहार की राजनीति पर

* नेपाल ओर भारत में माओवादी विचारधारा का पतन हुआ, और उसका सीधा असर भारत-नेपाल सीमा पर भी दिखाई दिया।

* सीमा पार से आने वाला वामपंथी नेटवर्क कमजोर

* कट्टरपंथी समूहों की फंडिंग व लॉजिस्टिक्स बाधित

* रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठ पर कड़ी रोक

* सीमावर्ती जिलों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत

* बिहार के सीमावर्ती इलाकों में वर्षों तक सक्रिय “वामपंथी-इस्लामी गठजोड़” को इस चुनाव ने पूरी तरह ध्वस्त किया।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का प्रभाव — सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उत्थान

बाबा बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का बिहार दौरा, प्रवचन और “हिंदू जागरण” का आह्वान चुनावी माहौल में सांस्कृतिक ऊर्जा लेकर आया।

वे बार-बार कहते रहे—

“अब हिंदू न डरेगा, न झुकेगा — सत्य और धर्म का समय आ गया है।”

उनके प्रवचनों ने ग्रामीण बिहार व युवा वर्ग में स्पष्ट संदेश दिया कि यह केवल राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि सनातन पहचान का पुनरुत्थान है।

डॉ. परविंद्र सिंह का अंतिम संवाद

डॉ. सिंह के अनुसार बिहार का 2025 जनादेश केवल NDA की जीत या विपक्ष की हार नहीं है—

यह भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की निर्णायक विजय है।

यह वामपंथी एजेंडे, तुष्टीकरण, कट्टरपंथ और झूठे नैरेटिव का अंतिम संस्कार है।

वे कहते हैं—

“2020 से 2025 तक, बिहार ने जो यात्रा तय की— वह विचारों की क्रांति है।
जनता ने साफ-साफ कह दिया: भारत सनातन है, और सनातन ही भारत की आत्मा है।”

“बिहार ने दिखा दिया — देश को तोड़ने वालों का अंत निश्चित है”

लेखक : रविंद्र आर्य