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भारत की परंपरा गतिशील है और इसी गतिशीलता में उसका जीवन-स्रोत निहित है: प्रो. आनंद प्रकाश

प्रकाशित: 17 Sep 2025

गोरखपुर, 16 सितम्बर।

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “मानसिक स्वास्थ्य एवं भारतीय ज्ञान परंपरा: योग एवं अन्य दर्शनों का योगदान” तथा 13वीं प्रो. एल.बी. त्रिपाठी स्मृति व्याख्यान श्रृंखला का आज सफलतापूर्वक समापन हुआ।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात मनोवैज्ञानिक प्रो. आनंद प्रकाश ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित योग, ध्यान, भावनात्मक संतुलन और आत्मनियंत्रण जैसे सिद्धांत आज भी मानसिक स्वास्थ्य और मनोविज्ञान के क्षेत्र में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक मनोविज्ञान की अनेक समस्याओं के समाधान भारतीय दर्शनों और योगशास्त्र में पहले से ही उपलब्ध हैं।

प्रो. प्रकाश ने कहा—

“भारतीय ज्ञान प्रणाली मनोविज्ञान को केवल रोग-उपचारक विज्ञान के रूप में नहीं देखती, बल्कि मानव जीवन को संतुलित, सार्थक और समग्र रूप से विकसित करने वाली विद्या के रूप में प्रस्तुत करती है।”

“ज्ञान का वर्धन आलोचना व समालोचना में होता है। समस्या या रोग का मूल कारण अविद्या है और Observation Power के लिए मन का एकाग्र होना आवश्यक है।”

“चलनशीलता ही परंपरा का वास्तविक स्वरूप है। भारत की परंपरा गतिशील है और इसी गतिशीलता में उसका जीवन-स्रोत निहित है।”

“पीयर रिव्यू (सहकर्मी समीक्षा) अकादमिक उत्कृष्टता और शोध को समृद्ध करने का सर्वोत्तम माध्यम है।”

सत्र का शुभारंभ प्रो. धनंजय कुमार के स्वागत भाषण से हुआ। इसके बाद प्रो. अनुभूति दुबे ने प्रो. एल.बी. त्रिपाठी स्मृति व्याख्यान श्रृंखला की महत्ता पर प्रकाश डाला।

संगोष्ठी की समन्वयक डॉ. विस्मिता पालीवाल ने दो दिवसीय आयोजन की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की और बताया कि इसमें देशभर से 150 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया तथा 80 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए।

सत्र का संचालन डॉ. गरिमा सिंह ने किया और आभार ज्ञापन डॉ. प्रियंका गौतम ने व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. अमृतांशु शुक्ल, प्रो. सीमा त्रिपाठी, डॉ. रश्मि रानी, डॉ. राम कीर्ति सिंह, डॉ. सत्य प्रकाश सिंह, डॉ. महेंद्र सिंह (मीडिया प्रभारी), डॉ. मनीष पांडे, डॉ. पवन कुमार, डॉ. दुर्गावती यादव, डॉ. शिव प्रकाश सिंह समेत विभागीय शोध छात्र उपस्थित रहे।