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जान जोखिम में डालकर काम कर रहे संविदा सफाई कर्मी : निचले पायदान पर खड़े कर्मचारियों की जान की कीमत को भी समझे

कानपुर | 25-Jul-2025 03:44 AM | 11 |
कानपुर
निचले पायदान पर खड़े कर्मचारियों की जान की कीमत को भी समझे

ये कोई 'बड़े साहब' तो हैं नहीं… जो इनकी सुरक्षा में सड़क को बैरीकेट करवा ही दिया जाए… संविदा सफाई कर्मी ही तो हैं… दुर्घटना होने पर झाड़ ही लेंगे… पल्ला…" — ये कटाक्ष उस कड़वी हकीकत को बयां करता है, जो इन दिनों उत्तर प्रदेश के कानपुर में देखने को मिल रही है।

कानपुर शहर के रामादेवी से टाटमिल मार्ग के बीच डिवाइडर पर सफाई कार्य चल रहा है। लेकिन यह सफाई कार्य जितना जरूरी है, उतना ही खतरनाक भी बन गया है—कम से कम उन सफाई कर्मचारियों के लिए जो इस काम को बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के अंजाम दे रहे हैं।

इन सफाई कर्मचारियों के पास ना तो सुरक्षा जैकेट है, ना हेलमेट, ना ट्रैफिक कोन, और ना ही कोई चेतावनी बोर्ड। आमतौर पर जब किसी अधिकारी या नेता का काफिला निकलता है, तो सड़कें खाली करवा दी जाती हैं, बैरिकेड्स लगा दिए जाते हैं और ट्रैफिक रोका जाता है। लेकिन जब बात आम सफाई कर्मचारियों की आती है, तो सुरक्षा जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं।

रोज़मर्रा की तेज रफ्तार ट्रैफिक के बीच इन संविदा कर्मचारियों को बिना किसी रुकावट के काम करते देखना एक बेहद खतरनाक दृश्य है। वाहन चालक डिवाइडर से सटे सड़कों पर तेज गति से निकलते हैं और किसी भी क्षण कोई बड़ा हादसा हो सकता है।

स्थानीय लोगों ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। एक राहगीर ने कहा, “हमने कई बार देखा है कि ये लोग झाड़ियों की सफाई कर रहे होते हैं और पीछे से गाड़ियां सर्र से निकल जाती हैं। अगर थोड़ी सी भी चूक हो जाए तो हादसा निश्चित है। सरकार को इनकी सुरक्षा के इंतज़ाम करने चाहिए।”

यह भी साफ नहीं है कि ये कर्मचारी नगर निगम के अधीन हैं, या किसी प्राइवेट ठेकेदार की तरफ से लगाए गए हैं। जवाबदेही का अभाव और व्यवस्थाओं की लापरवाही साफ झलक रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में स्वच्छता और स्मार्ट सिटी मिशन को लेकर करोड़ों रुपये के बजट आवंटित किए गए हैं। लेकिन क्या यह बजट केवल योजनाओं और विज्ञापन में ही सीमित रह जाएगा? क्या ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे इन अस्थायी कर्मचारियों की ज़िंदगियां इतनी सस्ती हैं कि उनके लिए एक ट्रैफिक कोन तक खर्च करना ज़रूरी नहीं समझा जाता?

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