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“भारत का पहला ड्रोन” बताने पर गल्गोटियास यूनिवर्सिटी घिरी, विशेषज्ञों ने कहा– दावा भ्रामक : ड्रोन परियोजना पर विवाद: तकनीकी समुदाय ने गल्गोटियास यूनिवर्सिटी के दावे पर उठाए सवाल

कानपुर | 18-Feb-2026 09:19 PM | 547 |
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ड्रोन परियोजना पर विवाद: तकनीकी समुदाय ने गल्गोटियास यूनिवर्सिटी के दावे पर उठाए सवाल

ग्रेटर नोएडा स्थित गल्गोटियास यूनिवर्सिटी एक विवाद में घिर गई है। आरोप है कि विश्वविद्यालय ने अपने एक ड्रोन प्रोजेक्ट को “भारत का पहला स्वदेशी ड्रोन” बताकर प्रचारित किया, जबकि विशेषज्ञों और उद्योग से जुड़े लोगों ने इस दावे को भ्रामक और तथ्यहीन बताया है। इस मामले के सामने आने के बाद तकनीकी समुदाय और शिक्षा जगत में बहस छिड़ गई है कि शैक्षणिक संस्थानों द्वारा शोध-उपलब्धियों को प्रचारित करते समय सटीकता और पारदर्शिता कितनी जरूरी है।
रिपोर्टों के अनुसार विश्वविद्यालय ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और प्रेस विज्ञप्तियों में दावा किया था कि उसके छात्रों और शोधकर्ताओं ने देश का पहला स्वदेशी ड्रोन विकसित किया है। हालांकि ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में काम कर रहे विशेषज्ञों ने तुरंत इस दावे पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि भारत में ड्रोन विकास का इतिहास एक दशक से अधिक पुराना है और कई स्टार्टअप, रक्षा संस्थान तथा निजी कंपनियां पहले से विभिन्न प्रकार के स्वदेशी ड्रोन बना और उपयोग कर रही हैं। ऐसे में किसी एक संस्थान द्वारा “पहला” होने का दावा करना तकनीकी रूप से गलत और भ्रामक माना जा रहा है।
तकनीकी विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित ड्रोन डिजाइन और क्षमताएं पहले से उपलब्ध कई ड्रोन प्लेटफॉर्म से मिलती-जुलती हैं। कुछ विशेषज्ञों ने इसे मौजूदा तकनीक के संशोधित संस्करण के रूप में बताया, न कि पूरी तरह नया या देश का पहला मॉडल। उनका कहना है कि शैक्षणिक परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना आवश्यक है, लेकिन उन्हें अतिरंजित दावों के साथ प्रस्तुत करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।
विवाद बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय के दावे को लेकर सोशल मीडिया पर भी आलोचना तेज हो गई। कई उपयोगकर्ताओं ने पुरानी भारतीय ड्रोन परियोजनाओं और कंपनियों के उदाहरण साझा कर विश्वविद्यालय के दावे को चुनौती दी। शिक्षा क्षेत्र के जानकारों ने कहा कि संस्थानों को ब्रांडिंग और प्रचार के लिए तथ्यात्मक शुद्धता से समझौता नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे छात्रों और शोध की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।
हालांकि विश्वविद्यालय की ओर से इस विवाद पर विस्तृत स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे दावों के लिए स्पष्ट तकनीकी प्रमाण और तुलनात्मक संदर्भ देना जरूरी होगा। यह मामला शिक्षा संस्थानों में शोध-प्रचार की विश्वसनीयता और जिम्मेदारी पर एक महत्वपूर्ण चर्चा के रूप में देखा जा रहा है।

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