पारापीपली में सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापनसुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष प्रसंग ने श्रोताओं को किया भावविभोरझालावाड़ जिले के गंगधार उपखण्ड क्षेत्र के ग्राम पारापीपली में आयोजित सप्तदिवसीय श्र...
पारापीपली में सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन
सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष प्रसंग ने श्रोताओं को किया भावविभोर
झालावाड़ जिले के गंगधार उपखण्ड क्षेत्र के ग्राम पारापीपली में आयोजित सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन कथा वाचक ने सुदामा चरित्र एवं राजा परीक्षित मोक्ष का भावपूर्ण वर्णन किया।
कथा के दौरान पंडित शर्मा ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से मनुष्य को भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है। इससे व्यक्ति जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने राजा परीक्षित के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि ऋषि के श्राप से तक्षक नाग के डसने का वरदान मिलने पर राजा परीक्षित ने राजपाट त्याग कर गंगा तट पर शुकदेव जी की शरण ली। सात दिनों तक भागवत कथा के श्रवण से उनका भय और आसक्ति समाप्त हो गई और अंततः उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
सुदामा-कृष्ण मित्रता प्रसंग का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने कहा कि जब सुदामा द्वारका पहुंचे तो भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा के स्वागत में भावविह्वल होकर दौड़ पड़े, उन्हें गले लगाया और सिंहासन पर बैठाया। भगवान ने सुदामा को धन से नहीं, बल्कि प्रेम और सच्ची मित्रता का उपहार दिया।
कथा के दौरान स्थानीय बाल कलाकारों द्वारा श्रीकृष्ण-सुदामा की आकर्षक झांकी भी प्रस्तुत की गई, जिसे श्रद्धालुओं ने खूब सराहा।
कथा श्रवण के लिए सुसनेर विधायक भैरोसिंह परिहार बापू भी कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने कथा वाचक का माला व दुपट्टा पहनाकर सम्मान किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामवासी ओर जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।