PHM NEWS

मनरेगा पर सियासी घमासान | रोजगार अधिकार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर खतरा

प्रकाशित: 01 Jan 2026

नई दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। मनरेगा के कथित कमजोर किए जाने और इसके बजट व क्रियान्वयन पर उठते सवालों के बीच विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने केंद्र सरकार की मंशा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मनरेगा के खात्मे का असली उद्देश्य गरीबों के रोजगार के अधिकार को समाप्त करना है।

आलोचकों का आरोप है कि केंद्र सरकार राज्यों से आर्थिक और राजनीतिक शक्ति छीनकर फैसलों का केंद्रीकरण कर रही है। मनरेगा जैसी योजनाएं राज्यों को न केवल आर्थिक मजबूती देती हैं, बल्कि ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक सहभागिता भी बढ़ाती हैं। ऐसे में इस योजना को कमजोर करना सीधे-सीधे राज्यों की स्वायत्तता पर हमला माना जा रहा है।

विपक्षी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि मनरेगा के लिए आवंटित धन में कटौती कर उसे बड़े उद्योगपतियों और अरबपति मित्रों को लाभ पहुंचाने की नीतियों में लगाया जा रहा है। उनका कहना है कि यह नीति “नीचे से ऊपर” अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय “ऊपर से नीचे” धन के केंद्रीकरण को बढ़ावा देती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मनरेगा जैसी योजना को समाप्त या निष्प्रभावी किया गया, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ेगी, पलायन तेज होगा और गांवों की क्रय शक्ति कमजोर पड़ेगी। इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बल्कि समग्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।

आलोचकों ने यह भी चेतावनी दी कि ‘एक अकेले प्रधानमंत्री’ की मनमानी का खामियाजा पूरा देश भुगतेगा। जब गांव कमजोर होंगे, तो शहरों पर भी दबाव बढ़ेगा और अंततः देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना कमजोर होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की जीवनरेखा है, जिसे मजबूत करना समय की जरूरत है।