नई दिल्ली। वरिष्ठ चिंतक और समाजशास्त्री हंसाराम ने एक कार्यक्रम में कहा कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ ही सार्थक होती है।” उन्होंने कहा ...
नई दिल्ली। वरिष्ठ चिंतक और समाजशास्त्री हंसाराम ने एक कार्यक्रम में कहा कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ ही सार्थक होती है।” उन्होंने कहा कि समाज की संरचना कुछ अनिवार्य शर्तों के साथ हुई थी, जिनमें व्यक्तिगत मूल्यों की रक्षा के साथ-साथ समाज के कल्याण को सर्वोपरि रखा जाना प्रमुख था।
प्रसिद्ध दार्शनिक जेरमी बेंथम के 'सबके लिए सबसे बड़ा सुख' के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए हंसाराम ने कहा कि आधुनिक कानून इसी विचारधारा पर आधारित हैं। भारत में भी संविधान ने अनुच्छेद 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार माना है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के माध्यम से उस पर कुछ आवश्यक प्रतिबंध लगाए गए हैं ताकि यह स्वतंत्रता समाज के हित के विरुद्ध न जाए।
उन्होंने चेताया कि आज सोशल मीडिया और इंटरनेट की सर्वसुलभता ने हर व्यक्ति को बोलने का मंच तो दिया है, लेकिन इसके साथ ही भ्रामक, अश्लील और समाज-विरोधी सामग्री की बाढ़ भी आ गई है। "यह कहना कि लोग यही सब देखना चाहते हैं, एक प्रकार की बौद्धिक लाचारी है," उन्होंने स्पष्ट कहा।
हंसाराम ने विशेष रूप से यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को संबोधित करते हुए कहा कि उनके विचार लाखों लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं। ऐसे में उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने कंटेंट के जरिए समाज की नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखें, न कि उन्हें तोड़ें।
उन्होंने कहा, "स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं है, बल्कि कर्तव्य भी है। अगर हम इसका दुरुपयोग करते हैं, तो यह समाज में अराजकता और असंतुलन को जन्म देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्देश्य समाज को दिशा देना है, न कि उसे भ्रमित करना।"
अंत में, उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक हित की सीमाओं को तय करते हुए इस स्वतंत्रता को सुरक्षित और मर्यादित रखे। तभी लोकतंत्र मजबूत और स्थायी रह सकेगा।