काठमांडू। नेपाल में हाल के दिनों में बढ़ते असंतोष और विरोध प्रदर्शनों ने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में हो रही घटनाएँ वही पैटर्न दोहरा रही हैं...
काठमांडू। नेपाल में हाल के दिनों में बढ़ते असंतोष और विरोध प्रदर्शनों ने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में हो रही घटनाएँ वही पैटर्न दोहरा रही हैं, जो श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में देखने को मिला था। खासकर नई पीढ़ी, जिसे GenZ कहा जाता है, अचानक से भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक रूप से सड़कों पर उतर आई है।
प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने मंत्रियों और नेताओं के आवासों पर धावा बोल दिया। कई जगहों पर लूटपाट और तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आई हैं। यह सब अचानक उस समय शुरू हुआ जब सरकार ने सोशल मीडिया और कुछ लोकप्रिय एप्स पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया शुरू की। इसके पहले तक हालात सामान्य दिखाई दे रहे थे, लेकिन अचानक गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह असंतोष केवल भ्रष्टाचार को लेकर नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर युवाओं की मैनिपुलेशन और बाहरी फंडिंग की भी आशंका जताई जा रही है। लाखों युवा सोशल मीडिया के माध्यम से प्रभावित हो रहे हैं और हजारों को कथित रूप से फंडिंग मिल रही है, जिससे आंदोलन हिंसक रूप लेता जा रहा है।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि नेपाल में तख्तापलट सफल हो जाता है, तो दक्षिण एशिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश की सुरक्षा पर सवाल उठ सकते हैं। लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर पड़ने से यह खतरा बढ़ जाएगा कि भीड़तंत्र किसी भी सरकार को गिराने में सक्षम हो जाएगी।
यह स्थिति केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान जनता ने राष्ट्रपति भवन तक कब्ज़ा कर लिया था। बांग्लादेश और म्यांमार में भी इसी तरह की उथल-पुथल देखने को मिली। पाकिस्तान में तो राजनीतिक अस्थिरता आज भी गहराई से महसूस की जा रही है। यही पैटर्न अब नेपाल में उभर रहा है, जिसने सभी पड़ोसी देशों को चिंता में डाल दिया है।
राजनीतिक टिप्पणीकार चेतावनी दे रहे हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा टूटने पर आम नागरिकों का जीवन नरक बन सकता है। सरकार बदलने का रास्ता यदि हिंसा और तोड़फोड़ से होकर गुजरेगा, तो न तो स्थिरता आएगी और न ही विकास संभव होगा।
नेपाल के मौजूदा हालात सिर्फ पड़ोसी देशों के लिए सबक नहीं हैं, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी हैं कि लोकतंत्र की रक्षा केवल वोट और संस्थाओं से ही हो सकती है, न कि अराजक भीड़ के हाथों से।