रेलवे में यात्रियों की तुलना में अधिक टिकट बेचे जाने का कारण केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि सामाजिक और तार्किक है। यह कम आय वाले उन लाखों लोगों के लिए यात्रा का एकमात्र विकल्प है, जो महंगे आरक्षित टिकट न...
रेलवे में यात्रियों की तुलना में अधिक टिकट बेचे जाने का कारण केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि सामाजिक और तार्किक है। यह कम आय वाले उन लाखों लोगों के लिए यात्रा का एकमात्र विकल्प है, जो महंगे आरक्षित टिकट नहीं खरीद सकते।
भीड़भाड़ की रोज़मर्रा की हकीकत
कल्पना करें कि एक ट्रेन इतनी भरी हुई है कि यात्री सामान रखने की रैक पर बैठे हैं, सीटों के बीच खड़े हैं, गलियारों में ठसाठस भरे हैं और दरवाजे जाम हो चुके हैं। यह भारतीय रेलवे की एक आम तस्वीर है, खासकर अनारक्षित श्रेणी में यात्रा करने वालों के लिए।
हाल ही में 15 फरवरी को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में 18 अनारक्षित यात्रियों की मौत और कई के घायल होने की घटना ने रेलवे की भीड़भाड़ और क्षमता की सीमाओं को उजागर किया। यह पहली बार नहीं हुआ और शायद आखिरी बार भी नहीं होगा।
अब दिल्ली उच्च न्यायालय समेत कई लोग पूछ रहे हैं: जब ट्रेनें पहले से ही ओवरलोड हैं, तो रेलवे ज्यादा टिकट क्यों बेचता है?
रेलवे का सामाजिक कर्तव्य और अनारक्षित श्रेणी की जरूरत
भारतीय रेलवे, एक सरकारी संस्था के रूप में, केवल एक परिवहन सेवा नहीं बल्कि एक सामाजिक सेवा प्रदाता भी है। देश में बड़ी संख्या में लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं, और अनारक्षित टिकट ही उनके लिए एकमात्र किफायती यात्रा विकल्प है।
उत्तर रेलवे के पूर्व प्रमुख मुख्य परिचालन प्रबंधक राजीव सक्सेना बताते हैं, “अगर रेलवे अनारक्षित टिकटों की बिक्री सीमित कर दे, तो लाखों लोग यात्रा करने से वंचित हो जाएंगे।”
लॉजिस्टिक्स की जटिलता और कानूनी दायरा
अनारक्षित टिकटों की बिक्री सीमित करना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि वे सामान्य प्रवेश टिकट की तरह काम करते हैं। यात्री किसी भी ट्रेन में चढ़ सकते हैं और रास्ते में कई स्टेशनों पर उतर सकते हैं। इससे किसी एक ट्रेन में कितने लोग यात्रा करेंगे, इसका पूर्वानुमान लगाना बेहद कठिन हो जाता है।
रेलवे अधिनियम 1989 की धारा 57 के अनुसार, प्रत्येक कोच में यात्रियों की अधिकतम संख्या तय करने और इसे प्रदर्शित करने की आवश्यकता है। लेकिन यह नियम अनारक्षित डिब्बों पर प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जाता, जिससे भारी भीड़भाड़ की स्थिति बनी रहती है।
सुरक्षा बनाम पहुंच: क्या समाधान है?
दिल्ली उच्च न्यायालय के सवालों ने रेलवे की पुरानी प्रथाओं को चुनौती दी है। रेलवे का दावा है कि उच्च मांग के कारण सख्त नियम लागू करना संभव नहीं, लेकिन अदालत इस दलील को कमजोर मानती है।
इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) के पूर्व महाप्रबंधक सुधांशु मणि कहते हैं, “यह केवल लॉजिस्टिक्स की समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत के विशाल जनसंख्या समूह के यात्रा करने के तरीके से भी जुड़ा है।”
क्या बदलाव होंगे?
भारत का रेलवे सिस्टम, एक ओर तो लाखों लोगों के लिए सस्ता सफर उपलब्ध कराता है, लेकिन दूसरी ओर यात्रियों को भीषण भीड़ और असुविधाओं से जूझना पड़ता है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सुरक्षा और पहुंच के बीच संतुलन बनाने के लिए ठोस सुधार होंगे?